सामग्री पर जाएँ
यह दिलचस्प है

प्सिलोसाइबिन न्यूरॉन्स के कनेक्शनों का पुनर्गठन करता है और साथ ही संपर्क बनाता व हटाता है

लेखकसंपादकीय टीम आज, 10:22 0
प्सिलोसाइबिन न्यूरॉन्स के कनेक्शनों का पुनर्गठन करता है और साथ ही संपर्क बनाता व हटाता है
विज्ञापन
संक्षेप में
  • चूहों में साइलोसाइबिन ने 24 घंटे के भीतर नए डेंड्राइटिक स्पाइन्स की संख्या बढ़ाई और उनके परिपक्व होने की प्रक्रिया तेज़ की
  • यह दवा कुछ पुराने संपर्कों के हटने से भी जुड़ी है, और इसका प्रभाव आंशिक रूप से पुराने दीर्घकालिक तनाव के इतिहास पर निर्भर करता है
  • ये नतीजे मतिभ्रम के बिना न्यूरोप्लास्टिसिटी को प्रभावित करने के तरीकों की खोज में मदद कर सकते हैं, लेकिन इसका चिकित्सीय लाभ अभी स्थापित नहीं हुआ है

साइलोसाइबिन कई दिशाओं में न्यूरॉन्स के बीच संपर्कों को बदलता है

कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, सैंटा क्रूज़ के शोधकर्ताओं ने अध्ययन किया कि साइलोसाइबिन—तथाकथित जादुई मशरूम में पाया जाने वाला एक साइकेडेलिक पदार्थ—तंत्रिका कोशिकाओं के बीच संपर्कों को कैसे प्रभावित करता है। यह अध्ययन 15 अक्टूबर को Nature Neuroscience पत्रिका में प्रकाशित हुआ; सूचना में प्रकाशन का वर्ष नहीं दिया गया है। लेखकों ने पाया कि यह दवा नए संपर्क बनने और उनके परिपक्व होने को बढ़ावा देती है, लेकिन पूरी तस्वीर केवल न्यूरॉन्स के बीच संचार बढ़ने तक सीमित नहीं है।

नए संपर्कों के बनने के साथ-साथ, साइलोसाइबिन कुछ पुराने संपर्कों को हटाने में भी मदद करता है। न्यूरोप्लास्टिसिटी को समझने के लिए यह महत्वपूर्ण है—यानी मस्तिष्क की अपनी संरचना और गतिविधि को बदलने, तथा संबंधों को बनाने, मज़बूत करने, पुनर्गठित करने या समाप्त करने की क्षमता। इस प्रकार, देखा गया प्रभाव न्यूरल संपर्कों के निर्माण और उनके चयन, दोनों को शामिल करता है। यह अध्ययन साबित नहीं करता कि इस तरह के पुनर्गठन से मानसिक स्थिति में सुधार ज़रूर होगा या यह मनुष्यों में भी उसी तरह होता है।

लेखकों के अनुसार, विशेष रूप से उल्लेखनीय नतीजा यह है कि संबंधों के पुनर्गठन से जुड़े कोशिकीय बदलावों को उस व्यवहारगत प्रतिक्रिया से अलग किया जा सकता है जिसे आम तौर पर साइकेडेलिक प्रभाव से जोड़ा जाता है। इससे यह संभावना बनती है कि मस्तिष्क पर कुछ अलग-अलग संरचनात्मक प्रभाव मतिभ्रम के बिना भी हासिल किए जा सकते हैं। हालांकि, ये निष्कर्ष चूहों पर किए गए प्रयोगों से निकले हैं—ये न तो उपचार का कोई तैयार तरीका हैं, न ही रोगियों में किसी प्रभाव की पुष्टि।

शोधकर्ताओं ने मस्तिष्क के पुनर्गठन का अध्ययन कैसे किया

बदलावों का पता लगाने के लिए टीम ने टू-फोटॉन माइक्रोस्कोपी का इस्तेमाल किया—यह एक इमेजिंग विधि है, जिससे जीवित ऊतक के भीतर मौजूद सूक्ष्म संरचनाओं को बारीकी से देखा जा सकता है। वैज्ञानिकों ने कई हफ्तों तक चूहों के न्यूरॉन्स पर अलग-अलग संपर्कों को ट्रैक किया। इस तरीके से उन्हें साइलोसाइबिन दिए जाने के बाद संपर्कों में होने वाले बदलावों को देखना संभव हुआ; वे केवल प्रयोग से पहले और बाद के मस्तिष्क की तुलना तक सीमित नहीं रहे।

अध्ययन का मुख्य केंद्र डेंड्राइटिक स्पाइन थे—न्यूरॉन्स पर मौजूद छोटी उभारनुमा संरचनाएँ, जो पड़ोसी तंत्रिका कोशिकाओं से संकेत ग्रहण करती हैं। ये सिनेप्स के निर्माण में भाग लेते हैं; सिनेप्स न्यूरॉन्स के बीच संचार के विशेष केंद्र होते हैं। सिनेप्स सूचना के प्रसंस्करण, सीखने, स्मृति और भावनात्मक नियमन के लिए महत्वपूर्ण हैं। उनकी संख्या, ताकत और व्यवस्था में बदलाव से मस्तिष्क में संकेतों का प्रवाह बदल सकता है। इस अध्ययन में इन प्रक्रियाओं के संरचनात्मक पहलू पर ही ध्यान दिया गया।

पदार्थ दिए जाने के 24 घंटों के भीतर ही वैज्ञानिकों ने बन रहे डेंड्राइटिक स्पाइन की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि देखी। इसके अलावा, ये नई संरचनाएँ असामान्य रूप से तेज़ी से परिपक्व हुईं। आमतौर पर युवा स्पाइन छोटे और अपरिपक्व रह सकते हैं—उन्हें ‘स्टब्बी’ कहा जाता है—और उनमें से कई अस्थिर होते हैं तथा पूरी तरह विकसित संपर्क बनने से पहले ही गायब हो जाते हैं। साइलोसाइबिन देने के बाद, एक बड़ा हिस्सा परिपक्व ‘मशरूम’ आकार तक पहुँचा; ऐसे स्पाइन आम तौर पर अधिक स्थिर होते हैं।

इसका प्रभाव तनावपूर्ण अनुभव और कुछ विशेष न्यूरॉन्स की गतिविधि पर निर्भर करता है

यह अध्ययन सेरेब्रल कॉर्टेक्स में न्यूरॉन्स के एक विशिष्ट समूह की ओर भी संकेत करता है, जो कनेक्शनों पर साइलोसाइबिन के प्रभाव के लिए आवश्यक भूमिका निभाता है। इससे संभावित तंत्रों का दायरा सीमित होता है: बात केवल पूरे मस्तिष्क पर पदार्थ के गैर-विशिष्ट प्रभाव की नहीं है। हालांकि, रिपोर्ट में इतना विवरण नहीं दिया गया है कि यह पता चल सके कि यह समूह पुनर्गठन को ठीक किस तरह नियंत्रित करता है और क्या भविष्य के उपचारों में इसे चुनिंदा रूप से प्रभावित किया जा सकता है।

अध्ययन के अनुसार, इस दवा का असर सभी मस्तिष्कों पर एक जैसा नहीं होता: यह आंशिक रूप से इस बात पर निर्भर करता है कि मस्तिष्क ने दीर्घकालिक तनाव का अनुभव किया था या नहीं। यह इस धारणा से सावधान करता है कि साइलोसाइबिन के प्रति प्रतिक्रिया एकसमान और अपरिवर्तनीय होती है। स्रोत यह स्पष्ट नहीं करता कि समूहों के बीच वास्तव में कौन-से अंतर देखे गए और हर मापदंड में वे कैसे सामने आए। इसलिए तनाव को एक महत्वपूर्ण कारक के रूप में पहचाना गया है, लेकिन इसका व्यावहारिक महत्व अभी पता लगाया जाना बाकी है।

इस अध्ययन की वरिष्ठ लेखिका, कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, सैंटा क्रूज़ में आणविक, कोशिकीय और विकासात्मक जीवविज्ञान की प्रोफ़ेसर यी ज़ुओ ने कहा कि यह शोध यह समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है कि साइलोसाइबिन न्यूरॉनल सर्किट को कैसे बदलता है और मानसिक विकारों के इलाज के लिए इसका क्या अर्थ हो सकता है। यह शोधकर्ता का आकलन है, पहले से सिद्ध उपचार का प्रमाण नहीं। प्रयोगों में चूहों में कोशिकीय बदलावों का वर्णन किया गया है और आगे की जाँच के लिए प्रश्न उठाने में मदद मिलती है।

प्रयोगशाला के नतीजों से संभावित उपचार तक

मनोसक्रिय साइकेडेलिक पदार्थों में विज्ञान की रुचि का इतिहास लंबा है। 20वीं सदी के मध्य में साइलोसाइबिन और एलएसडी ने धारणा, चेतना और मनोदशा पर अपने प्रभावों के कारण पश्चिमी शोधकर्ताओं का ध्यान खींचा; शुरुआती अध्ययनों से संकेत मिला कि मनोरोग के उपचार में इन पदार्थों का संभावित उपयोग हो सकता है। इसके बाद, 1970 में अमेरिका में नियंत्रित पदार्थ अधिनियम पारित होने से शोध की गति काफी धीमी हो गई, क्योंकि इस अधिनियम ने कड़े प्रतिबंध लगाए थे। हाल के वर्षों में इन यौगिकों में वैज्ञानिक रुचि फिर से बढ़ी है।

कुछ साइकेडेलिक्स को साइकोप्लास्टोजेन कहा जाता है, क्योंकि स्रोत में दिए गए वैज्ञानिक संदर्भ के अनुसार, वे एक खुराक के बाद न्यूरोप्लास्टिसिटी को बढ़ावा दे सकते हैं। यह शोधकर्ताओं के लिए आकर्षक है, क्योंकि अवसाद का संबंध मनोदशा, भावनाओं और व्यवहार को नियंत्रित करने वाले तंत्रिका-परिपथों में गड़बड़ी से हो सकता है। लेकिन यह व्यापक संभावना इस बात का संकेत नहीं है कि चूहों पर किए गए प्रयोग के नतीजे मनुष्यों में अवसाद या अभिघातोत्तर तनाव विकार के उपचार की पुष्टि करते हैं।

FDA ने पहले साइलोसाइबिन और MDMA को Breakthrough Therapy का दर्जा दिया था, जिसका उद्देश्य गंभीर बीमारियों के लिए संभावनाशील उपचारों के विकास और समीक्षा में तेज़ी लाना है; यह दवाओं को मंज़ूरी देने के समान नहीं है। सितंबर 2026 में, एजेंसी ने साइकेडेलिक्स के संभावित भावी चिकित्सीय उपयोग पर एक सार्वजनिक सुनवाई की। इसमें विशेषज्ञों की योग्यता, REMS कार्यक्रमों के ज़रिये जोखिम प्रबंधन और नैदानिक परीक्षणों की रूपरेखा पर चर्चा हुई। कोशिकीय तंत्रों की जानकारी भविष्य के तरीकों को अधिक सुरक्षित बनाने में मदद कर सकती है, लेकिन उनकी प्रभावशीलता का प्रश्न अभी खुला है।

स्रोत: ScienceDaily

सामग्री कितनी उपयोगी है?मूल्यांकन हमें विषयों का चयन करने में मदद करता है
00 मूल्यांकन
विश्लेषण

कहानी के आँकड़े

0दृश्य
0टिप्पणियाँ
4न्यूनतम पढ़ाई
55 / 56खंड में रैंक, पिछले 30 दिन

चर्चा

अभी तक कोई नहीं बोला — पहले बनें.

टिप्पणियाँ प्रतिभागियों द्वारा लिखी जाती हैं साइट में लॉग इन करें — यह मुफ्त है और एक मिनट लेता है। टिप्पणियों की मॉडरेशन की जाती है।
लॉग इन करें
विज्ञापन

MEGA: दुनिया आपकी जेब में

कहानियों, खोजों और विचारों की दुनिया, हमेशा आपकी जेब में। MEGA रोज़मर्रा की ज़िंदगी के लिए राशिफल, लेख, विश्व घटनाएँ और उपयोगी AI सेवाएँ एक साथ लाता है।

ऐप के बारे में
MEGA: दुनिया आपकी जेब में