मैडम बोवारी (1857)

| लेखक | गुस्ताव फ्लॉबर्ट |
|---|---|
| वर्ष | 1857 |
| शैली | क्लासिक्स |
फ्लोबेर ने गद्य को इस स्थिति में पहुंचा दिया, जिसमें हर शब्द अपने स्थान पर होता है और उसे बदला नहीं जा सकता — उसने आवश्यक वाक्यांश की खोज में हफ्तों बिताए और इसे दर्जनों बार फिर से लिखा। इस दौरान कहानी जानबूझकर साधारण है: प्रांतीय डॉक्टर एम्मा ने उपन्यास पढ़े, जीवन से जुनून की उम्मीद की, लेकिन उसे बोरियत, कर्ज और ज़िले की दिनचर्या मिली — और उसने अपनी मांग की। 1857 की किताब के चारों ओर का विवाद अदालत तक पहुंचा: लेखक पर नैतिकता का अपमान करने का आरोप लगाया गया, हालांकि नैतिकतावादी तो वही था, बस बिना किसी उपदेश के। फ्लोबेर ने खुद को पाठ से पूरी तरह हटा दिया — न सहानुभूति, न निंदा, बस दिखाया; यह ठंडी दृष्टि बाद की सभी साहित्य के लिए एक पाठ बन गई। यहीं से 'बोवारिज़्म' की परिभाषा आई — अपनी जिंदगी को दूसरों की कहानियों से मापने की आदत और इसके असंगति के लिए इसे तिरस्कृत करना। उपन्यास अप्रिय रूप से आधुनिक है: आज एम्मा सोशल मीडिया स्क्रॉल कर रही होती, और परिणाम लगभग वही होता।
MegaInet.art में पुस्तक का कार्ड — संदर्भ जानकारी। फ़ाइलें वितरित नहीं की जाती हैं। वास्तविक डेटा: विकिडेटा (CC0)।



